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फर्क पड़ता है, inspirational story in hindi

एक व्यक्ति नित्य ही समुद्र तट पर जाता और वहां घंटों बैठा रहता। आती-जाती लहरों को निरंतर देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे विक्षिप्त समझते और प्राय: उसका उपहास किया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता। एक दिन वह समुद्र तट पर खड़ा तरंगों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने समुद्र में कुछ फेंकना शुरू किया। उसकी इस गतिविधि को एक यात्री ने देखा। पहले तो उसने भी यही समझा कि यह मानसिक रूप से बीमार है, फिर उसके मन में आया कि इससे चलकर पूछें तो। वह व्यक्ति के निकट आकर बोला- भाई! यह तुम क्या कर रहे हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- देखते नहीं, सागर बार-बार अपनी लहरों को आदेश देता है कि वे इन नन्हे शंखों, घोंघों और मछलियों को जमीन पर पटककर मार दें। मैं इन्हें फिर से पानी में डाल देता हूं। यात्री बोला- यह क्रम तो चलता ही रहता है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, ऐसे में कुछ जीव तो बाहर होंगे ही। तुम्हारी इस चिंता से क्या अंतर पड़ेगा? उस व्यक्ति ने एक मुट्ठी शंख-घोंघों को अपनी अंजुली में उठाया और पानी में फेंकते हुए कहा- देखा कि नहीं, इनके जीवन में तो फर्क पड़ गया? वह यात्री सिर झुकाकर चलता बना और वह व्यक्ति वैसा ही करता रहा। सार यह है कि अच्छे कार्य का एक लघु प्रयास भी महत्वपूर्ण होता है। जैसे बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही नन्हे प्रयत्नों की श्रंखला से सत्कार्य को गति मिलती है। अत: बाधाओं की परवाह किए बगैर प्रयास करना न छोड़ें। 

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हिंदी जन की बोली है

एक डोर में सबको जो है बाँधती वह हिंदी है, हर भाषा को सगी बहन जो मानती वह हिंदी है। भरी-पूरी हों सभी बोलियां यही कामना हिंदी है, गहरी हो पहचान आपसी यही साधना हिंदी है, सौत विदेशी रहे न रानी यही भावना हिंदी है। तत्सम, तद्भव, देश विदेशी सब रंगों को अपनाती, जैसे आप बोलना चाहें वही मधुर, वह मन भाती, नए अर्थ के रूप धारती हर प्रदेश की माटी पर, 'खाली-पीली-बोम-मारती' बंबई की चौपाटी पर, चौरंगी से चली नवेली प्रीति-पियासी हिंदी है, बहुत-बहुत तुम हमको लगती 'भालो-बाशी', हिंदी है। उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी हिंदी जन की बोली है, वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी हिंदी वह हमजोली है, सागर में मिलती धाराएँ हिंदी सबकी संगम है, शब्द, नाद, लिपि से भी आगे एक भरोसा अनुपम है, गंगा कावेरी की धारा साथ मिलाती हिंदी है, पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी सेतु बनाती हिंदी है। -गिरिजा कुमार माथुर

Important general knowledge in hindi

अन्तराष्ट्रीय सीमाएँ मैकमोहन रेखा                   भारत एवं चीन रेडक्लिफ रेखा                    भारत एवं पाकिस्तान हिडनबर्ग रेखा                    जर्मन एवं पोलैंड 38 वीं समानांतर रेखा             उ. कोरिया एवं द. कोरिया मैगीनॉट रेखा                    जर्मनी एवं कनाडा 49 वीं समानांतर रेखा             यू.एस.ए. एवं कनाडा मेनरहीम रेखा                    रूस एवं फ़िनलैंड ड्यूरंड रेखा        ...

जलियाँवाला बाग में बसंत / सुभद्राकुमारी चौहान

यहाँ कोकिला नहीं , काग हैं , शोर मचाते ,  काले काले कीट , भ्रमर का भ्रम उपजाते।   कलियाँ भी अधखिली , मिली हैं कंटक - कुल से ,  वे पौधे , व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।   परिमल - हीन पराग दाग सा बना पड़ा है ,  हा ! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।   ओ , प्रिय ऋतुराज ! किन्तु धीरे से आना ,  यह है शोक - स्थान यहाँ मत शोर मचाना।   वायु चले , पर मंद चाल से उसे चलाना ,  दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।   कोकिल गावें , किन्तु राग रोने का गावें ,  भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।       लाना संग में पुष्प , न हों वे अधिक सजीले ,  तो सुगंध भी मंद , ओस से कुछ कुछ गीले।   किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना ,  स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।   कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर ,  कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।   आशाओं से भरे हृदय भी छिन्...