एक डोर में सबको जो है बाँधती वह हिंदी है, हर भाषा को सगी बहन जो मानती वह हिंदी है। भरी-पूरी हों सभी बोलियां यही कामना हिंदी है, गहरी हो पहचान आपसी यही साधना हिंदी है, सौत विदेशी रहे न रानी यही भावना हिंदी है। तत्सम, तद्भव, देश विदेशी सब रंगों को अपनाती, जैसे आप बोलना चाहें वही मधुर, वह मन भाती, नए अर्थ के रूप धारती हर प्रदेश की माटी पर, 'खाली-पीली-बोम-मारती' बंबई की चौपाटी पर, चौरंगी से चली नवेली प्रीति-पियासी हिंदी है, बहुत-बहुत तुम हमको लगती 'भालो-बाशी', हिंदी है। उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी हिंदी जन की बोली है, वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी हिंदी वह हमजोली है, सागर में मिलती धाराएँ हिंदी सबकी संगम है, शब्द, नाद, लिपि से भी आगे एक भरोसा अनुपम है, गंगा कावेरी की धारा साथ मिलाती हिंदी है, पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी सेतु बनाती हिंदी है। -गिरिजा कुमार माथुर
सुनो एक कविगोष्ठी का , अद्भुत सम्वाद । कलाकार द्वय भिडे गए , चलने लगा विवाद ।। चलने लगी विवाद , एक थे कविवर ' घायल ' । दूजे श्री ' तलवार ', नई कविता के कायल ।। कह ' काका ' कवि , पर्त काव्य के खोल रहे थे। कविता और अकविता को , वे तोल रहे थे ।। शुरू हुई जब वार्ता , बोले हिन्दी शुद्ध । साहित्यिक विद्वान् थे , परम प्रचण्ड प्रबुद्ध ।। परम प्रचण्ड प्रबुद्ध , तर्क में आई तेजी । दोनो की जिह्वा पर , चढ़ बैठी अगरेज़ी ॥ कह ' काका ' घनघोर , चली इंगलिश में गाली । संयोजक जी ने गोष्ठी , ' डिसमिस ' कर डाली ।। काका हाथरसी